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BNSS Section 156 (CrPC 137) — Procedure where existence of public right is denied
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) धारा 156 (पुरानी सीआरपीसी 137)
| Law / कानून | Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) |
|---|---|
| Section / धारा | 156 |
| Chapter / अध्याय | Chapter XI — Maintenance Of Public Order And Tranquillity |
| Old law / पुरानी धारा | Code of Criminal Procedure (CrPC) — CrPC 137 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बीएनएसएस धारा 156 क्या है? / What is BNSS Section 156?
Procedure where existence of public right is denied
बीएनएसएस धारा 156 पुरानी सीआरपीसी की कौन-सी धारा है? / Which old CrPC section is BNSS Section 156?
BNSS Section 156 = CrPC 137. Procedure where existence of public right is denied
Full text (English)
(1) Where an order is made under section 152 for the purpose of preventing obstruction, nuisance or danger to the public in the use of any way, river, channel or place, the Magistrate shall, on the appearance before him of the person against whom the order was made, question him as to whether he denies the existence of any public right in respect of the way, river, channel or place, and if he does so, the Magistrate shall, before proceeding under section 157, inquire into the matter.
(2) If in such inquiry the Magistrate finds that there is any reliable evidence in support of such denial, he shall stay the proceedings until the matter of the existence of such right has been decided by a competent Court; and, if he finds that there is no such evidence, he shall proceed as laid down in section 157.
(3) A person who has, on being questioned by the Magistrate under sub-section (1), failed to deny the existence of a public right of the nature therein referred to, or who, having made such denial, has failed to adduce reliable evidence in support thereof, shall not in the subsequent proceedings be permitted to make any such denial.
(2) If in such inquiry the Magistrate finds that there is any reliable evidence in support of such denial, he shall stay the proceedings until the matter of the existence of such right has been decided by a competent Court; and, if he finds that there is no such evidence, he shall proceed as laid down in section 157.
(3) A person who has, on being questioned by the Magistrate under sub-section (1), failed to deny the existence of a public right of the nature therein referred to, or who, having made such denial, has failed to adduce reliable evidence in support thereof, shall not in the subsequent proceedings be permitted to make any such denial.
पूरा पाठ (हिंदी)
(1) जहां किसी मार्ग, नदी, जलसरणी या स्थान के उपयोग में जनता को होने वाली बाधा, न्यूसेन्स या खतरे का निवारण करने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश धारा 52 के अधीन किया जाता है वहां मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के जिसके विरुद्ध वह आदेश किया गया है अपने समक्ष उपस्थित होने पर, उससे प्रश्न करेगा कि क्या वह उस मार्ग, नदी, जलसरणी या स्थान के बारे में किसी लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार करता है और यदि वह ऐसा करता है तो मजिस्ट्रेट धारा 57 के अधीन कार्यवाही करने के पहले उस बात की जांच करेगा ।
(2) यदि ऐसी जांच में मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ऐसे इंकार के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य है तो वह कार्यवाही को तब तक के लिए रोक देगा जब तक ऐसे अधिकार के अस्तित्व का मामला सक्षम न्यायालय द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है ; और यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है तो वह धारा 57 के अनुसार कार्यवाही करेगा ।
(3) मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्रश्न किए जाने पर, जो व्यक्ति उसमें निर्दिष्ट प्रकार के लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार नहीं करता है या ऐसा इंकार करने पर उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य देने में असफल रहता है उसे पश्चातवर्ती कार्यवाहियों में ऐसा कोई इंकार नहीं करने दिया जाएगा ।
457. (1) यदि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध धारा 52 के अधीन आदेश दिया गया है, उपस्थित है और आदेश के विरुद्ध कारण दर्शित करता है तो मजिस्ट्रेट उस मामले में उस प्रकार साक्ष्य लेगा जैसे समन मामले में लिया जाता है ।
(2) यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि आदेश या तो जैसा मूलतः किया गया था उस रूप में या ऐसे परिवर्तन के साथ, जिसे वह आवश्यक समझे, युक्तियुक्त और उचित है तो वह आदेश, यथास्थिति, परिवर्तन के बिना या ऐसे परिवर्तन सहित अंतिम कर दिया जाएगा ॥
(3) यदि मजिस्ट्रेट का ऐसा समाधान नहीं होता है तो उस मामले में आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी :
परन्तु इस धारा के अधीन कार्यवाहियां नब्बे दिन की अवधि के भीतर यथासंभवशीघ्र पूरी की जाएंगी, जो उन कारणों के लिए जो लेखबदूध किए जाएं, एक सौ बीस दिन तक विस्तारित की जा सकेगी ।
🔎 सरल सार, केस-लॉ और बोलकर/फ़ोटो से धारा खोजें(2) यदि ऐसी जांच में मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ऐसे इंकार के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य है तो वह कार्यवाही को तब तक के लिए रोक देगा जब तक ऐसे अधिकार के अस्तित्व का मामला सक्षम न्यायालय द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है ; और यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है तो वह धारा 57 के अनुसार कार्यवाही करेगा ।
(3) मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्रश्न किए जाने पर, जो व्यक्ति उसमें निर्दिष्ट प्रकार के लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार नहीं करता है या ऐसा इंकार करने पर उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य देने में असफल रहता है उसे पश्चातवर्ती कार्यवाहियों में ऐसा कोई इंकार नहीं करने दिया जाएगा ।
457. (1) यदि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध धारा 52 के अधीन आदेश दिया गया है, उपस्थित है और आदेश के विरुद्ध कारण दर्शित करता है तो मजिस्ट्रेट उस मामले में उस प्रकार साक्ष्य लेगा जैसे समन मामले में लिया जाता है ।
(2) यदि मजिस्ट्रेट का यह समाधान हो जाता है कि आदेश या तो जैसा मूलतः किया गया था उस रूप में या ऐसे परिवर्तन के साथ, जिसे वह आवश्यक समझे, युक्तियुक्त और उचित है तो वह आदेश, यथास्थिति, परिवर्तन के बिना या ऐसे परिवर्तन सहित अंतिम कर दिया जाएगा ॥
(3) यदि मजिस्ट्रेट का ऐसा समाधान नहीं होता है तो उस मामले में आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी :
परन्तु इस धारा के अधीन कार्यवाहियां नब्बे दिन की अवधि के भीतर यथासंभवशीघ्र पूरी की जाएंगी, जो उन कारणों के लिए जो लेखबदूध किए जाएं, एक सौ बीस दिन तक विस्तारित की जा सकेगी ।
Source: India Code — The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023. All BNSS sections
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