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BNSS Section 343 (CrPC 306) — Tender of pardon to accomplice
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) धारा 343 (पुरानी सीआरपीसी 306) — सह-अपराधी को क्षमादान
| Law / कानून | Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) |
|---|---|
| Section / धारा | 343 |
| Chapter / अध्याय | Chapter XXVI — General Provisions As To Inquiries And Trials |
| Old law / पुरानी धारा | Code of Criminal Procedure (CrPC) — CrPC 306 |
सरल हिंदी सार
अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल व्यक्ति से साक्ष्य लेने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जाँच या विचारण के किसी भी चरण में इस शर्त पर क्षमादान दे सकता है कि वह घटना का पूरा सच बताए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बीएनएसएस धारा 343 क्या है? / What is BNSS Section 343?
Tender of pardon to accomplice — सह-अपराधी को क्षमादान: अपराध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल व्यक्ति से साक्ष्य लेने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जाँच या विचारण के किसी भी चरण में इस शर्त पर क्षमादान दे सकता है कि वह घटना का पूरा सच बताए।
बीएनएसएस धारा 343 पुरानी सीआरपीसी की कौन-सी धारा है? / Which old CrPC section is BNSS Section 343?
BNSS Section 343 = CrPC 306. Tender of pardon to accomplice
Full text (English)
(2) This section applies to—
(a) any offence triable exclusively by the Court of Session or by the Court of a Special Judge appointed under any other law for the time being in force;
(b) any offence punishable with imprisonment which may extend to seven years or with a more severe sentence.
(3) Every Magistrate who tenders a pardon under sub-section (1) shall record—
(a) his reasons for so doing;
(b) whether the tender was or was not accepted by the person to whom it was made, and shall, on application made by the accused, furnish him with a copy of such record free of cost.
(4) Every person accepting a tender of pardon made under sub-section (1)—
(a) shall be examined as a witness in the Court of the Magistrate taking cognizance of the offence and in the subsequent trial, if any;
(b) shall, unless he is already on bail, be detained in custody until the termination of the trial.
(5) Where a person has accepted a tender of pardon made under sub-section (1) and has been examined under sub-section (4), the Magistrate taking cognizance of the offence shall, without making any further inquiry in the case—
(a) commit it for trial—
(i) to the Court of Session if the offence is triable exclusively by that Court or if the Magistrate taking cognizance is the Chief Judicial Magistrate;
(ii) to a Court of Special Judge appointed under any other law for the time being in force, if the offence is triable exclusively by that Court;
(b) in any other case, make over the case to the Chief Judicial Magistrate who shall try the case himself.
पूरा पाठ (हिंदी)
(2) यह धारा निम्नलिखित को लागू होती है :--
(क) अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा विचारणीय कोई अपराध ;
(ख) ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो या अधिक कठोर दंड से दंडनीय कोई अपराध । (3) प्रत्येक मजिस्ट्रेट, जो उपधारा (1) के अधीन क्षमा-दान करता है,--
(क) ऐसा करने के अपने कारणों को अभिलिखित करेगा ;
(ख) यह अभिलिखित करेगा कि क्षमा-दान उस व्यक्ति द्वारा, जिसको कि वह किया गया था स्वीकार कर लिया गया था या नहीं,
और अभियुक्त द्वारा आवेदन किए जाने पर उसे ऐसे अभिलेख की प्रतिलिपि नि:शुल्क देगा ।
(4) उपधारा (1) के अधीन क्षमा-दान स्वीकार करने वाले-- (क) प्रत्येक व्यक्ति की अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में और पश्चात्वर्ती विचारण में, यदि कोई हो, साक्षी के रूप में परीक्षा की जाएगी ; (ख) प्रत्येक व्यक्ति को, जब तक कि वह पहले से ही जमानत पर न हो, विचारण खत्म होने तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा ।
(5) जहां किसी व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन किया गया क्षमा-दान स्वीकार कर लिया है और उसकी उपधारा (4) के अधीन परीक्षा की जा चुकी है, वहां अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट, मामले में कोई अतिरिक्त जांच किए बिना,--
(1) यदि अपराध अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है या यदि संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है तो, उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा ;
(फ यदि अपराध अनन्यत: तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा विचारणीय है तो उस न्यायालय को सुपुर्द कर देगा ;
(ख) किसी अन्य दशा में, मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के हवाले करेगा जो उसका विचारण स्वयं करेगा 344. मामले की सुपुर्दगी के पश्चात् किसी समय किन्तु निर्णय दिए जाने के पूर्व वह न्यायालय जिसे मामला सुपुर्द किया जाता है किसी ऐसे अपराध से प्रत्यक्ष या ऊप्रत्यक्ष रूप में सम्बदूध या संबंधित समझे जाने वाले किसी व्यक्ति का साक्ष्य विचारण में अभिप्राप्त करने की इष्टि से ऐसे व्यक्ति को उसी शर्त पर क्षमा-दान कर सकेगा । 345. (1) जहां ऐसे व्यक्ति के बारे में जिसने धारा 343 या धारा 344 के अधीन क्षमा-दान स्वीकार कर लिया है, लोक अभियोजक प्रमाणित करता है कि उसकी राय में ऐसे व्यक्ति ने या तो किसी अत्यावश्यक बात को जानबूझकर छिपा कर या मिथ्या साक्ष्य देकर उस शर्त का पालन नहीं किया है जिस पर क्षमा-दान किया गया था, वहां ऐसे व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसके बारे में ऐसे क्षमा-दान किया गया था या किसी अन्य अपराध के लिए, जिसका वह उसी विषय के संबंध में दोषी प्रतीत होता है, और मिथ्या साक्ष्य के अपराध के लिए भी विचारण किया जा सकेगा :
परन्तु ऐसे व्यक्ति का विचारण अन्य अभियुक्तों में से किसी के साथ संयुक्ततः नहीं किया जाएगा :
परन्तु यह और कि मिथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए ऐसे व्यक्ति का विचारण उच्च न्यायालय की मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा और धारा 25 या धारा 379 की कोई बात उस अपराध को लागू नहीं होगी ।
(2) क्षमा-दान स्वीकार करने वाले ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया और धारा 83 के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा या धारा 343 की उपधारा (4) के अधीन किसी न्यायालय द्वारा अभिलिखित कोई कथन ऐसे विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा ।
(3) ऐसे विचारण में अभियुक्त यह अभिवचन करने का हकदार होगा कि उसने उन शर्तों का पालन कर दिया है जिन पर उसे क्षमा-दान दिया गया था ; और तब यह साबित करना अभियोजन का काम होगा कि ऐसी शर्त का पालन नहीं किया गया है ।
(क) यदि वह सेशन न्यायालय है तो आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाने और समझाए जाने के पूर्व ;
(ख) यदि वह मजिस्ट्रेट का न्यायालय है तो अभियोजन के साक्षियों का साक्ष्य लिए जाने के पूर्व, अभियुक्त से पूछेगा कि क्या वह यह अभिवचन करता है कि उसने उन शर्तों का पालन किया है जिन पर उसे क्षमा-दान दिया गया था ।
(5) यदि अभियुक्त ऐसा अभिवचन करता है तो न्यायालय उस अभिवाक् को अभिलिखित करेगा और विचारण के लिए अग्रसर होगा और वह मामले में निर्णय देने के पूर्व इस विषय में निष्कर्ष निकालेगा कि अभियुक्त ने क्षमा की शर्तों का पालन किया है या नहीं ; और यदि यह निष्कर्ष निकलता है कि उसने ऐसा पालन किया है तो वह इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी, दोषमुक्ति का निर्णय देगा ।
Source: India Code — The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023. All BNSS sections
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