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BNSS Section 383 (CrPC 344) — Summary procedure for trial for giving false evidence
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) धारा 383 (पुरानी सीआरपीसी 344)
| Law / कानून | Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) |
|---|---|
| Section / धारा | 383 |
| Chapter / अध्याय | Chapter XXVIII — Provisions As To Offences Affecting The Administration Of Justice |
| Old law / पुरानी धारा | Code of Criminal Procedure (CrPC) — CrPC 344 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बीएनएसएस धारा 383 क्या है? / What is BNSS Section 383?
Summary procedure for trial for giving false evidence
बीएनएसएस धारा 383 पुरानी सीआरपीसी की कौन-सी धारा है? / Which old CrPC section is BNSS Section 383?
BNSS Section 383 = CrPC 344. Summary procedure for trial for giving false evidence
Full text (English)
(1) If, at the time of delivery of any judgment or final order disposing of any judicial proceeding, a Court of Session or Magistrate of the first class expresses an opinion to the effect that any witness appearing in such proceeding had knowingly or wilfully given false evidence or had fabricated false evidence with the intention that such evidence should be used in such proceeding, it or he may, if satisfied that it is necessary and expedient in the interest of justice that the witness should be tried summarily for giving or fabricating, as the case may be, false evidence, take cognizance of the offence and may, after giving the offender a reasonable opportunity of showing cause why he should not be punished for such offence, try such offender summarily and sentence him to imprisonment for a term which may extend to three months, or to fine which may extend to one thousand rupees, or with both.
(2) In every such case the Court shall follow, as nearly as may be practicable, the procedure prescribed for summary trials.
(3) Nothing in this section shall affect the power of the Court to make a complaint under section 379 for the offence, where it does not choose to proceed under this section.
(4) Where, after any action is initiated under sub-section (1), it is made to appear to the Court of Session or Magistrate of the first class that an appeal or an application for revision has been preferred or filed against the judgment or order in which the opinion referred to in that sub-section has been expressed, it or he shall stay further proceedings of the trial until the disposal of the appeal or the application for revision, as the case may be, and thereupon the further proceedings of the trial shall abide by the results of the appeal or application for revision.
(2) In every such case the Court shall follow, as nearly as may be practicable, the procedure prescribed for summary trials.
(3) Nothing in this section shall affect the power of the Court to make a complaint under section 379 for the offence, where it does not choose to proceed under this section.
(4) Where, after any action is initiated under sub-section (1), it is made to appear to the Court of Session or Magistrate of the first class that an appeal or an application for revision has been preferred or filed against the judgment or order in which the opinion referred to in that sub-section has been expressed, it or he shall stay further proceedings of the trial until the disposal of the appeal or the application for revision, as the case may be, and thereupon the further proceedings of the trial shall abide by the results of the appeal or application for revision.
पूरा पाठ (हिंदी)
(1) यदि किसी न्यायिक कार्यवाही को निपटाते हुए निर्णय या अंतिम आदेश देते समय कोई सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट यह राय व्यक्त करता है कि ऐसी कार्यवाही में उपस्थित होने वाले किसी साक्षी ने जानते हुए या जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य दिया है या इस आशय से मिथ्या साक्ष्य गढ़ा है कि ऐसा साक्ष्य ऐसी कार्यवाही में प्रयुक्त किया जाए तो यदि उसका समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में यह आवश्यक और समीचीन है कि साक्षी का, यथास्थिति, मिथ्या साक्ष्य देने या गढ़ने के लिए संक्षेपत: विचारण किया जाना चाहिए तो वह ऐसे अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का कि क्यों न उसे ऐसे अपराध के लिए दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात्, ऐसे अपराधी का संक्षेपत: विचारण कर सकेगा और उसे कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडित कर सकेगा ।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा ।
(3) जहां न्यायालय इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए अग्रसर नहीं होता है वहां इस धारा की कोई बात, अपराध के लिए धारा 379 के अधीन परिवाद करने की उस न्यायालय की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
(4) जहां, उपधारा (1) के अधीन किसी कार्यवाही के प्रारंभ किए जाने के पश्चात्, सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत कराया जाता है कि उस निर्णय या आदेश के विरुद्ध जिसमें उस उपधारा में निर्दिष्ट राय अभिव्यक्त की गई है, अपील या पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है वहां वह, यथास्थिति, अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के निपटाए जाने तक आगे विचारण की कार्यवाहियों को रोक देगा और तब आगे विचारण की कार्यवाहियां अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के परिणामों के अनुसार होंगी ।
384... (1) जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 20, धारा 23, धारा 24, धारा 25 या धारा 267 में वर्णित है, किसी सिविल, दंड या राजस्व न्यायालय की इृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है, तब न्यायालय अभियुक्त को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकेगा और उसी दिन न्यायालय के उठने के पूर्व किसी समय, अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का, कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् अपराधी को एक हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने का और जुर्माना देने में चूक होने पर एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर न दे दिया गया हो, सादा कारावास का दंडादेश दे सकेगा ।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय वह तथ्य जिससे अपराध गठित होता है, अपराधी द्वारा किए गए कथन के (यदि कोई हो) सहित, तथा निष्कर्ष और दंडादेश भी अभिलिखित करेगा ।
(3) यदि अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 267 के अधीन है तो अभिलेख में यह दर्शित होगा कि जिस न्यायालय के कार्य में विघ्न डाला गया था या जिसका अपमान किया गया था, उसकी बैठक किस प्रकार की न्यायिक कार्यवाही के संबंध में और उसके किस प्रक्रम पर हो रही थी और किस प्रकार का विघ्न डाला गया या अपमान किया गया था ।
🔎 सरल सार, केस-लॉ और बोलकर/फ़ोटो से धारा खोजें(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय संक्षिप्त विचारणों के लिए विहित प्रक्रिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा ।
(3) जहां न्यायालय इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए अग्रसर नहीं होता है वहां इस धारा की कोई बात, अपराध के लिए धारा 379 के अधीन परिवाद करने की उस न्यायालय की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
(4) जहां, उपधारा (1) के अधीन किसी कार्यवाही के प्रारंभ किए जाने के पश्चात्, सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत कराया जाता है कि उस निर्णय या आदेश के विरुद्ध जिसमें उस उपधारा में निर्दिष्ट राय अभिव्यक्त की गई है, अपील या पुनरीक्षण के लिए आवेदन किया गया है वहां वह, यथास्थिति, अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के निपटाए जाने तक आगे विचारण की कार्यवाहियों को रोक देगा और तब आगे विचारण की कार्यवाहियां अपील या पुनरीक्षण के आवेदन के परिणामों के अनुसार होंगी ।
384... (1) जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 20, धारा 23, धारा 24, धारा 25 या धारा 267 में वर्णित है, किसी सिविल, दंड या राजस्व न्यायालय की इृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किया जाता है, तब न्यायालय अभियुक्त को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकेगा और उसी दिन न्यायालय के उठने के पूर्व किसी समय, अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दर्शित करने का, कि क्यों न उसे इस धारा के अधीन दंडित किया जाए, उचित अवसर देने के पश्चात् अपराधी को एक हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने का और जुर्माना देने में चूक होने पर एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर न दे दिया गया हो, सादा कारावास का दंडादेश दे सकेगा ।
(2) ऐसे प्रत्येक मामले में न्यायालय वह तथ्य जिससे अपराध गठित होता है, अपराधी द्वारा किए गए कथन के (यदि कोई हो) सहित, तथा निष्कर्ष और दंडादेश भी अभिलिखित करेगा ।
(3) यदि अपराध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 267 के अधीन है तो अभिलेख में यह दर्शित होगा कि जिस न्यायालय के कार्य में विघ्न डाला गया था या जिसका अपमान किया गया था, उसकी बैठक किस प्रकार की न्यायिक कार्यवाही के संबंध में और उसके किस प्रक्रम पर हो रही थी और किस प्रकार का विघ्न डाला गया या अपमान किया गया था ।
Source: India Code — The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023. All BNSS sections
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