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BNSS Section 457 (CrPC 417) — Power to appoint place of imprisonment
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) धारा 457 (पुरानी सीआरपीसी 417)
| Law / कानून | Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) |
|---|---|
| Section / धारा | 457 |
| Chapter / अध्याय | Chapter XXXIV — Execution, Suspension, Remission And Commutation Of Sentences |
| Old law / पुरानी धारा | Code of Criminal Procedure (CrPC) — CrPC 417 |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
बीएनएसएस धारा 457 क्या है? / What is BNSS Section 457?
Power to appoint place of imprisonment
बीएनएसएस धारा 457 पुरानी सीआरपीसी की कौन-सी धारा है? / Which old CrPC section is BNSS Section 457?
BNSS Section 457 = CrPC 417. Power to appoint place of imprisonment
Full text (English)
(1) Except when otherwise provided by any law for the time being in force, the State Government may direct in what place any person liable to be imprisoned or committed to custody under this Sanhita shall be confined.
(2) If any person liable to be imprisoned or committed to custody under this Sanhita is in confinement in a civil jail, the Court or Magistrate ordering the imprisonment or committal may direct that the person be removed to a criminal jail.
(3) When a person is removed to a criminal jail under sub-section (2), he shall, on being released therefrom, be sent back to the civil jail, unless either—
(a) three years have elapsed since he was removed to the criminal jail, in which case he shall be deemed to have been released from the civil jail under section 58 of the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908); or e
(b) the Court which ordered his imprisonment in the civil jail has certified to the officer in charge of the criminal jail that he is entitled to be released under section 58 of the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908).
(2) If any person liable to be imprisoned or committed to custody under this Sanhita is in confinement in a civil jail, the Court or Magistrate ordering the imprisonment or committal may direct that the person be removed to a criminal jail.
(3) When a person is removed to a criminal jail under sub-section (2), he shall, on being released therefrom, be sent back to the civil jail, unless either—
(a) three years have elapsed since he was removed to the criminal jail, in which case he shall be deemed to have been released from the civil jail under section 58 of the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908); or e
(b) the Court which ordered his imprisonment in the civil jail has certified to the officer in charge of the criminal jail that he is entitled to be released under section 58 of the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908).
पूरा पाठ (हिंदी)
(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, राज्य सरकार यह निदेश दे सकेगी कि किसी व्यक्ति को, जो इस संहिता के अधीन कारावासित किए जाने या अभिरक्षा के लिए सुपुर्द किए जाने के लिए दायी है, किस स्थान में परिरुदूध किया जाएगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस संहिता के अधीन कारावासित किए जाने या अभिरक्षा के लिए सुपुर्द किए जाने के लिए दायी है, सिविल कारागार में परिरुदूध है तो कारागार या सुपुर्दगी के लिए आदेश देने वाला न्यायालय या मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को दांडिक कारागार में भेजे जाने का निदेश दे सकेगा ।
(3) जब कोई व्यक्ति उपधारा (2) के अधीन दांडिक कारागार में भेजा जाता है तब, वहां से छोड़ दिए जाने पर उसे सिविल कारागार को लॉटाया जाएगा, जब तक कि उसे या तो--
(क) दांडिक कारागार में उसके भेजे जाने से तीन वर्ष बीत गए हैं, उस दशा में वह सिविल प्रक्रिया संहिता, 908 की धारा 58 के अधीन सिविल कारागार से छोड़ा गया समझा जाएगा ; या
(ख) सिविल कारागार में उसके कारावास का आदेश देने वाले न्यायालय द्वारा दांडिक कारागार के भारसाधक अधिकारी को यह प्रमाणित करके भेज दिया गया है कि वह सिविल प्रक्रिया संहिता, 908 की धारा 58 के अधीन छोड़े जाने का हकदार है । 458. (1) जहां धारा 453 द्वारा उपबंधित उन मामलों से भिन्न मामलों में
अभियुक्त आजीवन कारावास या किसी अवधि के कारावास के लिए दंडादिष्ट किया गया है, वहां दंडादेश देने वाला न्यायालय उस कारागार या अन्य स्थान को, जिसमें वह परिरुदूध है या उसे परिरुदूध किया जाना है तत्काल वारंट भेजेगा और यदि अभियुक्त पहले से ही उस कारागार या अन्य स्थान में परिरुदूध नहीं है तो वारंट के साथ उसे ऐसी कारागार या अन्य स्थान को भिजवाएगा :
परन्तु जहां अभियुक्त को न्यायालय के उठने तक के लिए कारावास का दंडादेश दिया गया है, वहां वारंट तैयार करना या वारंट कारागार को भेजना आवश्यक नहीं होगा और अभियुक्त को ऐसे स्थान में, जो न्यायालय निदेशित करे, परिरुदूध किया जा सकेगा ।
(2) जहां अभियुक्त न्यायालय में उस समय उपस्थित नहीं है, जब उसे ऐसे कारावास का दंडादेश दिया गया है, जैसा उपधारा (॥) में उल्लिखित है, वहां न्यायालय उसे कारागार या ऐसे अन्य स्थान में, जहां उसे परिरुदूध किया जाना है, भेजने के प्रयोजन से उसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी करेगा ; और ऐसे मामले में दंडादेश उसकी गिरफ्तारी की तारीख से प्रारंभ होगा ।
🔎 सरल सार, केस-लॉ और बोलकर/फ़ोटो से धारा खोजें(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस संहिता के अधीन कारावासित किए जाने या अभिरक्षा के लिए सुपुर्द किए जाने के लिए दायी है, सिविल कारागार में परिरुदूध है तो कारागार या सुपुर्दगी के लिए आदेश देने वाला न्यायालय या मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को दांडिक कारागार में भेजे जाने का निदेश दे सकेगा ।
(3) जब कोई व्यक्ति उपधारा (2) के अधीन दांडिक कारागार में भेजा जाता है तब, वहां से छोड़ दिए जाने पर उसे सिविल कारागार को लॉटाया जाएगा, जब तक कि उसे या तो--
(क) दांडिक कारागार में उसके भेजे जाने से तीन वर्ष बीत गए हैं, उस दशा में वह सिविल प्रक्रिया संहिता, 908 की धारा 58 के अधीन सिविल कारागार से छोड़ा गया समझा जाएगा ; या
(ख) सिविल कारागार में उसके कारावास का आदेश देने वाले न्यायालय द्वारा दांडिक कारागार के भारसाधक अधिकारी को यह प्रमाणित करके भेज दिया गया है कि वह सिविल प्रक्रिया संहिता, 908 की धारा 58 के अधीन छोड़े जाने का हकदार है । 458. (1) जहां धारा 453 द्वारा उपबंधित उन मामलों से भिन्न मामलों में
अभियुक्त आजीवन कारावास या किसी अवधि के कारावास के लिए दंडादिष्ट किया गया है, वहां दंडादेश देने वाला न्यायालय उस कारागार या अन्य स्थान को, जिसमें वह परिरुदूध है या उसे परिरुदूध किया जाना है तत्काल वारंट भेजेगा और यदि अभियुक्त पहले से ही उस कारागार या अन्य स्थान में परिरुदूध नहीं है तो वारंट के साथ उसे ऐसी कारागार या अन्य स्थान को भिजवाएगा :
परन्तु जहां अभियुक्त को न्यायालय के उठने तक के लिए कारावास का दंडादेश दिया गया है, वहां वारंट तैयार करना या वारंट कारागार को भेजना आवश्यक नहीं होगा और अभियुक्त को ऐसे स्थान में, जो न्यायालय निदेशित करे, परिरुदूध किया जा सकेगा ।
(2) जहां अभियुक्त न्यायालय में उस समय उपस्थित नहीं है, जब उसे ऐसे कारावास का दंडादेश दिया गया है, जैसा उपधारा (॥) में उल्लिखित है, वहां न्यायालय उसे कारागार या ऐसे अन्य स्थान में, जहां उसे परिरुदूध किया जाना है, भेजने के प्रयोजन से उसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी करेगा ; और ऐसे मामले में दंडादेश उसकी गिरफ्तारी की तारीख से प्रारंभ होगा ।
Source: India Code — The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023. All BNSS sections
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