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CPC Section 21 — Objections to jurisdiction

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) धारा 21 — अधिकारिता के बारे में आक्षेप

Law / कानूनCode of Civil Procedure, 1908 (CPC)
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी)
Section / धारा21
Chapter / अध्यायPart I — Suits In General

सरल हिंदी सार

क्षेत्राधिकार पर आपत्ति
स्थानीय क्षेत्राधिकार की आपत्ति पहले अवसर पर, मुद्दे तय होने से पहले उठानी होती है, वरना वह छोड़ दी मानी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

सीपीसी धारा 21 क्या है? / What is CPC Section 21?
Objections to jurisdiction — क्षेत्राधिकार पर आपत्ति: स्थानीय क्षेत्राधिकार की आपत्ति पहले अवसर पर, मुद्दे तय होने से पहले उठानी होती है, वरना वह छोड़ दी मानी जाती है।

Full text (English)

4[(1)] No objection as to the place of suing shall be allowed by any Appellate or Revisional Court unless such objection was taken in the Court of first instance at the earliest possible opportunity and in all cases where issues are settled at or before such settlement, and unless there has been a consequent failure of justice. [(2) No objection as to the competence of a Court with reference to the pecuniary limits of its jurisdiction shall be allowed by any Appellate or Revisional Court unless such objection was taken in the Court of first instance at the earliest possible opportunity, and, in all cases where issues are settled, at or before such settlement, and unless there has been a consequent failure of justice.
(3) No objection as to the competence of the executing Court with reference to the local limits of its jurisdiction shall be allowed by any Appellate or Revisional Court unless such objection was taken in the executing Court at the earliest possible opportunity, and unless there has been a consequent failure of justice.]

पूरा पाठ (हिंदी)

[(1)] वाद लाने के स्थान के सम्बन्ध में कोई भी आक्षेप किसी भी अपील या पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसा आक्षेप प्रथम बार के न्यायालय में यथासंभव सर्वप्रथम अवसर पर और उन सभी मामलों में, जिनमें विवाद्यक स्थिर किए जाते हैं, ऐसे स्थिरीकरण के समय या उसके पहले न किया गया हो और जब तक कि उसके परिणामस्वरूप न्याय की निष्फलता न हुई हो ।
5[(2) किसी न्यायालय की अधिकारिता की धन-सम्बन्धी परिसीमा के आधार पर उसकी सक्षमता के बारे में कोई आक्षेप किसी अपील या पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा तब तक अनुज्ञा नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसा आक्षेप प्रथम बार के न्यायालय में यथासंभव सर्वप्रथम अवसर पर और उन सभी मामलों में, जिनमें विवाद्यक स्थिर किए जाते हैं, ऐसे स्थिरीकरण के समय या उसके पहले न किया गया हो और जब तक कि उसके परिणामस्वरूप न्याय की निष्फलता न हुई हो ।
(3) किसी निष्पादन-न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के आधार पर उसकी सक्षमता के बारे में कोई आक्षेप अपील या पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा तब तक अनुज्ञा नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसा आक्षेप निष्पादन-न्यायालय में यथासंभव सर्वप्रथम अवसर पर न किया गया हो और जब तक कि उसके परिणास्वरूप न्याय की निष्फलता न हुई हो ।]
"[2क. वाद लाने के स्थान के बारे में आक्षेप पर डिक्री को अपास्त करने के लिए वाद का वर्जन--उसी हक के अधीन मुकदमा करने वाले उन्हीं पक्षकारों के बीच या ऐसे पक्षकारों के बीच जिनसे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैं, किसी पूर्ववर्ती वाद में पारित डिक्री की विधिमान्यता को वाद लाने के स्थान के बारे में किसी आक्षेप के आधार पर प्रश्नगत करने वाला कोई वाद नहीं लाया जाएगा ।
स्पष्टीकरण--“पूर्ववर्ती वाद” पद से वह वाद अभिप्रेत है जो उस वाद के विनिश्चय के पहले विनिश्चित हो चुका है जिनमें डिक्री की विधिमान्यता का प्रश्न उठाया गया है, चाहे पूर्वतन निश्चित वाद उस वाद से पहले संस्थित किया गया हो या बाद में जिसमें डिक्री की विधिमान्यता का प्रश्न उठाया गया है ।]

Source: India Code — The Code of Civil Procedure, 1908 (As on 10 Jan 2026). All CPC sections

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