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CPC Order 6 Rule 17 — Amendment of pleadings
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) आदेश 6 नियम 17 — अभिवचनों का संशोधन
| Law / कानून | Code of Civil Procedure, 1908 (CPC) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) |
|---|---|
| Section / धारा | O6R17 |
| Chapter / अध्याय | Pleadings Generally |
सरल हिंदी सार
अभिवचन में संशोधन
न्यायालय किसी भी चरण में अभिवचन में संशोधन की अनुमति दे सकता है। विचारण शुरू होने के बाद केवल तब, जब पक्ष दिखाए कि पूरी तत्परता के बावजूद मामला पहले नहीं उठाया जा सकता था।
न्यायालय किसी भी चरण में अभिवचन में संशोधन की अनुमति दे सकता है। विचारण शुरू होने के बाद केवल तब, जब पक्ष दिखाए कि पूरी तत्परता के बावजूद मामला पहले नहीं उठाया जा सकता था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
सीपीसी आदेश 6 नियम 17 क्या है? / What is CPC Order 6 Rule 17?
Amendment of pleadings — अभिवचन में संशोधन: न्यायालय किसी भी चरण में अभिवचन में संशोधन की अनुमति दे सकता है। विचारण शुरू होने के बाद केवल तब, जब पक्ष दिखाए कि पूरी तत्परता के बावजूद मामला पहले नहीं उठाया जा सकता था।
Full text (English)
The Court may at any stage of the proceedings allow either party to alter or amend his pleadings in such manner and on such terms as may be just, and all such amendments shall be made as may be necessary for the purpose of determining the real questions in controversy between the parties:
Provided that no application for amendment shall be allowed after the trial has commenced, unless the Court comes to the conclusion that in spite of due diligence, the party could not have raised the matter before the commencement of trial.
Provided that no application for amendment shall be allowed after the trial has commenced, unless the Court comes to the conclusion that in spite of due diligence, the party could not have raised the matter before the commencement of trial.
पूरा पाठ (हिंदी)
न्यायालय कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, किसी भी पक्षकार को, ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों पर, जो न्यायसंगत हों, अपने अभिवचनों को परिवर्तित या संशोधित करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा और वे सभी संशोधन किए जाएंगे जो दोनों पक्षकारों के बीच विवाद के वास्तविक प्रश्नों के अवधारण के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों :
परंतु विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् संशोधन के लिए किसी आवेदन को तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायालय इस निर्णय पर न पहुंचे कि सम्यक् तत्परता बरतने पर भी वह पक्षकार, विचारण प्रारंभ होने से पूर्व वह विषय नहीं उठा सकता था ।
परंतु विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् संशोधन के लिए किसी आवेदन को तब तक अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायालय इस निर्णय पर न पहुंचे कि सम्यक् तत्परता बरतने पर भी वह पक्षकार, विचारण प्रारंभ होने से पूर्व वह विषय नहीं उठा सकता था ।
प्रमुख निर्णय / Landmark judgments
Revajeetu Builders & Developers v. Narayanaswamy & Sons — सर्वोच्च न्यायालय, 2009, (2009) 10 SCC 84
संशोधन की अनुमति के मानदंड — वास्तविक विवाद तय करने के लिए आवश्यक हो, दूसरे पक्ष को अपूरणीय हानि न हो, और मामला मूल रूप से न बदले।
संशोधन की अनुमति के मानदंड — वास्तविक विवाद तय करने के लिए आवश्यक हो, दूसरे पक्ष को अपूरणीय हानि न हो, और मामला मूल रूप से न बदले।
Source: India Code — The Code of Civil Procedure, 1908 (As on 10 Jan 2026). All CPC sections
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