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CPC Order 34 Rule 13 — Application of proceeds
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) आदेश 34 नियम 13 — आगमों का उपयोजन
| Law / कानून | Code of Civil Procedure, 1908 (CPC) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (सीपीसी) |
|---|---|
| Section / धारा | O34R13 |
| Chapter / अध्याय | Suits Relating To Mortgages Of Immovable Property |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
सीपीसी आदेश 34 नियम 13 क्या है? / What is CPC Order 34 Rule 13?
Application of proceeds
Full text (English)
(1) Such proceeds shall be brought into Court and applied as follows:— first, in payment of all expenses incident to the sale or properly incurred in any attempted sale; secondly, in payment of whatever is due to the prior mortgagee on account of the prior mortgage, and of costs, properly incurred in connection therewith; thirdly, in payment in all interest due on account of the mortgage in consequence whereof the sale was directed, and of the costs of the suit in which the decree directing the sale was made; fourthly, in payment of the principal money due on account of that mortgage; and lastly, the residue (if any) shall be paid to the person proving himself to be interested in the property sold, or if there are more such persons than one, than two, to such persons according to their respective interests therein or upon their joint receipt.
(2) Nothing in this rule or in rule 12 shall be deemed to affect the powers conferred by section 57 of the Transfer of Property Act, 1882 (4 of 1882).
(2) Nothing in this rule or in rule 12 shall be deemed to affect the powers conferred by section 57 of the Transfer of Property Act, 1882 (4 of 1882).
पूरा पाठ (हिंदी)
(1) ऐसे आगम न्यायालय में लाए जाएंगे और निम्न प्रकार से उपयोजित किए जाएंगे,--
प्रथमत:, विक्रय से आनुषंगिक या किसी प्रयतित विक्रय में उचित रूप से उपगत व्ययों का संदाय करने में ;
द्वितीयत:, पूर्विक बन्धक मद्ध जो कुछ पूर्विक बन्धकदार को शोध्य हैं उसका और उसके बारे में उचित रूप में उपगत खर्चों का संदाय करने में ;
तृतीयत:, जिस बन्धक के परिणामस्वरूप विक्रय निर्दिष्ट किया गया था उस मद्धे शोध्य सभी ब्याज का और उस वाद में के जिसमें कि विक्रय का निदेश देने वाली डिक्री पारित की गई थी, खर्चों का संदाय करने में ;
चतुर्थत: उस बन्धक मद्धे शोध्य मूलधन का संदाय करने में ; तथा
अन्तत:, यदि कुछ अवशिष्ट रहे तो वह उस व्यक्ति को जो यह साबित कर दे कि विक्रीत सम्पत्ति में वह हितबद्ध है, या यदि ऐसे व्यक्ति एक से अधिक हैं तो ऐसे व्यक्तियों को, उस सम्पत्ति में अपने-अपने हितों के अनुसार या उनकी संयुक्त रसीद पर दे दी जाएगी ।
(2) इस नियम की या नियम 2 की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 882 (882 का 4) की धारा 57 द्वारा प्रदत्त शक्तियों पर प्रभाव डालती है ।
प्रथमत:, विक्रय से आनुषंगिक या किसी प्रयतित विक्रय में उचित रूप से उपगत व्ययों का संदाय करने में ;
द्वितीयत:, पूर्विक बन्धक मद्ध जो कुछ पूर्विक बन्धकदार को शोध्य हैं उसका और उसके बारे में उचित रूप में उपगत खर्चों का संदाय करने में ;
तृतीयत:, जिस बन्धक के परिणामस्वरूप विक्रय निर्दिष्ट किया गया था उस मद्धे शोध्य सभी ब्याज का और उस वाद में के जिसमें कि विक्रय का निदेश देने वाली डिक्री पारित की गई थी, खर्चों का संदाय करने में ;
चतुर्थत: उस बन्धक मद्धे शोध्य मूलधन का संदाय करने में ; तथा
अन्तत:, यदि कुछ अवशिष्ट रहे तो वह उस व्यक्ति को जो यह साबित कर दे कि विक्रीत सम्पत्ति में वह हितबद्ध है, या यदि ऐसे व्यक्ति एक से अधिक हैं तो ऐसे व्यक्तियों को, उस सम्पत्ति में अपने-अपने हितों के अनुसार या उनकी संयुक्त रसीद पर दे दी जाएगी ।
(2) इस नियम की या नियम 2 की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 882 (882 का 4) की धारा 57 द्वारा प्रदत्त शक्तियों पर प्रभाव डालती है ।
Source: India Code — The Code of Civil Procedure, 1908 (As on 10 Jan 2026). All CPC sections
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